कोश-विज्ञान

   कोश-विज्ञान


कोश-विज्ञान भी भाषा-विज्ञान की एक शाखा के रूप माना और जाना जाता है। डॉ० भोला नाथ तिवारी
जैसे भाषा-वैज्ञानिक इसे 'शब्द-विज्ञान' से संबंद्ध शाखा मानना अधिक समीचीन समझते हैं। उनकी दृष्टि में इसमें
खास तरह से शब्दों का ही अध्ययन किया जाता है।
          शब्द को ब्रह्म कहा गया है। शब्द अनंत है। मानव जाति के तो सारे व्यवहार ही शब्दों पर आधारित हैं।
जैन आगमों में शब्दों के मुख्य दो प्रकार माने गए हैं: जीव शब्द और अजीव शब्द । मानवेतर प्राणियों का तो सामान्य
ध्वनि या शब्द विशेष से ही काम चल जाता है परंतु मानव ने नए नए आविष्कार किए हैं और असंख्य पदार्थों से
उसका संबंध होता रहा है इसलिये उसका शब्द भंडार बढ़ता ही गया है। नये शब्द बनते हैं और शब्दों के रूप एवं
अर्थ में परिवर्तन भी होता है।
       विश्व की सभी भाषाओं का अपना अपना शब्द भंडार है। एक ही भाषा के सभी शब्दों का व्यवहार शायद
ही कोई व्यक्ति कर पाए परंतु बुद्धि के विकास के साथ ही अनेक तरह के विचार व्युत्पन्न होते हैं, और तब शब्दों
के अधिकाधिक व्यवहार की आवश्यकता होने लगती है। साहित्य, कला, विज्ञान, दर्शन और ज्ञान की अन्यान्य
दिशाओं के विकास के साथ साथ शब्द-समृद्धि होती जाती है और उन शब्दों का शुद्ध और सही रूप तथा उसके
विविध अर्थों का जानना जरूरी हो जाता है। बस यहीं से 'शब्द-कोश' रचने की भूमिका बनती है। प्रत्येक समृद्ध
भाषा और साहित्य के लिए ऐसे कोश-ग्रंथों की उपयोगिता और आवश्यकता अनिवार्य-सी बन गयी है।
वास्तव में 'कोश-विज्ञान' कोश निर्माण का ही विज्ञान है । कोश निर्माण के सिद्धांतों की चर्चा कोश विधान
में की जाती है। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर 'कोश' बनाए जाते हैं।


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