कोशों के प्रकार

  कोशों के प्रकार 


कोशों के प्रकार का सीधा ताल्लुक उसकी शब्द-व्युत्पनि के ढंग, शब्दों के उच्चारण के तौर, अर्थ, प्रयोग
तथा व्याकरण के आधार पर उसकी श्रेणी गणना से है। इन्हीं आधारों पर कोशों की कई कोटियाँ बनी हैं। कोशों
के बनाए जाने की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है जो कुछ सिद्धांतों पर आधारित होती है।

1. शब्द-संग्रह या संकलन की प्रेरणा और प्रकृति,

2. किस समय की भाषा के शब्द हैं,

3. कोश में कितने शब्दों को समाहित करना है,

4. शब्दों के रखने का क्रम क्या है,

5. और, उक्त कोश-निर्माण का प्रयोजन क्या है;

      डॉ० भोलानाथ तिवारी जैसे भाषाविद् कोशों के मूलतः तीन ही प्रकार मानते हैं-व्यक्ति-कोश, पुस्तक-कोश
और भाषा-कोश।
            व्यक्ति-कोश― किसी एक व्यक्ति द्वारा अपने साहित्य में प्रयुक्त शब्दों का कोई कोश व्यक्ति-कोश कहलाता
है। शेक्सपियर, मिल्टन, तुलसीदास आदि के कोश इसी प्रकार के हैं।
         पुस्तक-कोश― ऐसा कोश भी होता है जो केवल एक पुस्तक में प्रयुक्त शब्दों का ही हो। बाइबिल-कोश,
मानस-कोश या कुरान-कोश इसी प्रकार के कोश हैं।
            भाषा-कोश― ऐसा कोश केवल एक भाषा (बोली आदि) का ही हो सकता है या एक से अधिक भाषाओं
का भी ऐसा कोश हो सकता है। एक भाषा का कोश (जिनमें अर्थ उस भाषा से उसी भाषा में दिये गये हैं, जैसे
हिन्दी से हिंदी, अंग्रेजी से अंग्रेजी या जिनमें एक भाषा से दूसरी भाषा में हों, जैसे अंग्रेजी से हिंदी, रूसी से अंग्रेजी)
प्रभुखतः तीन प्रकार के हो सकते हैं :
1. वर्णणात्मक भाषा-कोश

2. तुलनात्मक भाषा-कोश

3. ऐतिहासिक भाषा-कोश

वर्णनात्मक भाषा-कोश― इसमें किसी भाषा में किसी एक काल में प्रयुक्त सारे शब्दों और उनके समस्त
अर्थों को लेते हैं। वस्तुतः 'वर्णनात्मक कोश' में अर्थ-प्रचलन के आधार पर शब्द क्रमबद्ध किये जाने चाहिएँ-जो
अर्थ सबसे अधिक प्रचलित हो उन्हें सबसे पहले और जो सबसे कम प्रचलित हों उन्हें बाद में । कभी-कभी अर्थ
के कम या अधिक प्रचलन के संबंध में विवाद भी खड़ा हो सकता है।

तुलनात्मक भाषा कोश इसमें दो भाषाओं के शब्दों की तुलना के आधार पर शब्दकम रहता है।

ऐतिहासिक भाषा कोश― किसी भाषा के विकास को समझने के लिये ऐतिहासिक भाषा कोश बहुत
सहायक होता है । ऐतिहासिक भाषा कोश में किसी भाषा में केवल प्रचलित शब्दों या उसके प्रचलित अर्थों को ही
मतेकर सारे शब्दों और उसके सारे अर्थों को लेते हैं। वर्णनात्मक कोश में अर्थ प्रचलन के आधार पर शब्द योजित
होता है। यहाँ अर्थ अपने इतिहास के आधार पर नियोजित होता है। अर्थों को कालक्रम से दिया जाता है अर्थात्
एक हजार ईस्वी सन् में प्रचलित अर्थ पहले फिर क्रम से ग्यारह सौ, बारह सौ आदि में प्रचलित अर्थ दिया जाएगा।
    इस प्रकार कोश निर्माण के लिये यह आवश्यक है कि उस भाषा का साहित्य उपलव्य हो। ऐसे कोश निर्माण
के पूर्व दो बातें आवश्यक हैं: (1) उस भाषा में प्राप्त सभी ग्रंथों का पाठ पाठालोचन के आधार पर सुनिश्चित कर लिया जाय ।
        (2) सभी रचनाओं का काल निश्चित कर लिया जाय । इन दो बातों को कर लेने के बाद यह निश्चय करना
आसान हो जायगा कि किस सदी में कौन शब्द किस अर्थ में प्रयुक्त होता था। इसीसे ऐतिहासिक भाषा-कोश बनाना
सरल हो जायगा । ऐतिहासिक भाषा कोश सदा ही पूर्ण नहीं होता क्योंकि शोध और खोज जारी है। नयी रचनाओं
का प्रकाश में आना जारी है। इससे तथ्य में परिवर्तन करना पड़ सकता है। संस्कृत का मोनियर विलियम्स का कोश
इसी प्रकार का है, यद्यपि यह अपूर्ण है। अंग्रेजी का 'ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी' इस प्रकार का अबतक का मानक कोश
बनाने का प्रयास है। इसी तरह कोशों के अन्य-अन्य प्रकार भी हैं :
      (i) पारिभाषिक कोश― भाषा-कोश के अंतर्गत ही पारिभाषिक कोश भी आते हैं। किसी भी भाषा में
विभिन्न विषयों में (इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, भाषा-विज्ञान, दर्शन, मनोविज्ञान आदि) या उनकी शाखाओं (प्राचीन
भूगोल, सांख्यिकी, ध्वनि-विज्ञान) में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों के कोश बनने लगे हैं। ऐसे ही साहित्य के भी कोश
बन रहे हैं। डॉ० धीरेंद्र वर्मा का हिंदी का 'साहित्यकोश' या 'संत साहित्य' कोश ऐसी ही कोशपरक प्रस्तुतियाँ हैं।
      (ii) पर्याय कोश-यह भी भाषा― कोश का एक रूप है जिनमें मिलते-जुलते अर्थों के शब्द एक साथ रखे
जाते हैं। इसमें भी कभी-कभी विलोम शब्दों का भी उल्लेख कर दिया जाता है।
     (iii) मुहावरा और लोकोक्ति या या कहावत कोश― ये प्रत्यक्षतया शब्दकोश नहीं है किंतु भाषा से तो
संबंद्ध हैं ही। तभी भाषा कोश के प्रसंग में ये उल्लेखनीय हैं। ये दोनो या तीनों ही कोश वर्णनात्मक, तुलनात्मक
और ऐतिहासिक तीनों प्रकार के बताए जाते हैं।
      (iv) बहुभाषा-कोश― ये दो या अधिक भाषाओं के हो सकते हैं। इतना ही नहीं इसी तर्ज पर कथा-कोश,
जीवनी-कोश और विश्वकोश जैसे कोशों का भी निर्माण हुआ है, हो रहा है।
      (v) बोली-कोश― ऐसे कोशों में किसी खास बोली में प्राप्त शब्दों का कोश या फिर एक भाषा की प्राय:
सभी बोलियों के शब्दों को प्रस्तुत किया जाता है।
(vi) तकनीकी शब्दों का कोश― इसमें खासकर विधि, प्रशासन, प्रौद्योगिकी या जैविकी और भौतिकी और
विषयों में प्रयोग में आने वाले शब्दों को लिया जाता है।

(vii) वर्तनी-कोश― भाषा में शब्दों के मानक रूप और उसकी वर्तनी का ऐसे कोशों में निरूपण होता है
ऐसे कोशों के शब्दों के मानवीकृत वर्तनी रूप के कारण भाषिक मानवीकरण में सहायता मिलती है।

(viii) उच्चारण-कोश-शब्दों के मानक उच्चारण कर भी कोश बनने लगे हैं। अंग्रेजी में डेनियल जोंस का
अंग्रेजी भाषा का उच्चारण-कोश सर्वज्ञात और उदाहरणीय हैं।

(ix) रचना-कोश― आजकल किसी खास रचनाकर की एक रचना या सभी रचनाओं में प्रयोग में आए सभी
शब्दों को सम्मिलित किया जाता है जैसे कबीर, तुलसी, सूर और प्रसाद, निराला या पंत-शब्दकोश ।
     इस प्रकार कोशों के अब संख्यातीत प्रकार हो सकते हैं। कोश-निर्माण के लिए अपेक्षित शर्ते:

1. शब्द-संकलन― कोश-निर्माण में सबसे प्रथम कार्य कोश-निर्माता के लिये यही है। कोश यदि जीवित
भाषा का बनाना है तो शब्द लोगों से सुनकर संग्रह करना पड़ता है। यदि साहित्य या पुरानी भाषा का बनाना है तो
शब्द पुस्तकों से लेने पड़ेंगे। लोगों से सुनकर संग्रह करने में पूर्ण कोश बनाना प्रायः कठिन-सा है, क्योंकि हर जीवित
भाषा में शब्दों की संख्या बढ़ती रहती है। नये शब्द विभिन्न स्रोतों से आते रहते हैं।

2. वर्तनी― शब्दों की वर्तनी सुनिश्चित कर लेना कोश-निर्माण की आवश्यक शर्त है। सर्वाधिक आवश्यक है
एक रूपता। अनेकरूपता होने पर कोश में शब्द रहने पर भी मिलते नहीं।

3. शब्द-निर्माण― इस कठिन कार्य के संदर्भ में अनेक प्रश्न उठ खड़े होते हैं जैसे किस शब्द को मूल मानें
और किसको दूसरे के अंतर्गत रखें; समस्त पदों को प्रथम के साथ रखें या दूसरे के। इसी तरह ध्वनि की दृष्टि से
एक दीखनेवाले शब्द को एक माने या अधिक, वगैरह।

4. शब्द-क्रम― कोश में शब्द विशेष क्रम से दिए जाते हैं ताकि देखने वाला उन्हें सरलता से पा सके । संसार
में कोशों में अनेक तरह के शब्द-क्रम प्रचालित रहे हैं जिनमें से कुछ प्रमुख ये हैं :

(क) वर्णानुक्रम–शब्दों के क्रम वर्णानुक्रम से रखे जाते हैं। पहले शब्द केवल प्रथम वर्ण के आधार पर रखे
जाते थे, जैसे यदि किसी भाषा में 'क' से प्रारंभ होनेवाले 5000 शब्द हैं तो वे एक जगह बिना किसी क्रम से रखे
जाते थे और खोजने वाले को सारे शब्दों को देखकर अपेक्षित शब्द खोजना पड़ता था। बाद में शब्द के दूसरे वर्ण
का विचार होने लगा और अंत में सारे वर्णों का।

(ख) अक्षर-संख्या–अक्षरों की संख्या के आधार पर भी शब्दों को रखा जाता है। भारत में ऐसे एकापारी
कोश मिलते हैं। चीनी तथा कुछ और भाषाओं में भी यह पद्धति प्रचलित रही है। इसमें एक अक्षर वाले शब्द पहले,
फिर दो वाले, फिर तीन वाले भी रखे जाते हैं।

(ग) सुर प्रधान भाषाओं में वर्णानुक्रम या अक्षर-संख्या के आधार पर शज्यों के रखने के अतिरिकन उन्हें सूर्ण
के आधार पर भी रखा जाता है, क्योंकि वहाँ एक ही शब्द कई सुरों में प्रयुक्त होता है ।

(घ) विचारों के आधार पर-पर्याय-कोशों में शब्दों को भावों या विचारों के आधार पर रखा जाता है, जैसे
सारे जीवों के शब्द एक स्थान पर । ऐसे ही धर्म, अंग, खाद्य पदार्थ, कला, विज्ञान आदि अलग-अलग ।

(ङ) व्युत्पत्ति के आधार पर कभी-कभी शब्द व्युत्पनियों के आधार पर रखे जाते हैं। अरबी में ऐसे कोश
मिलते हैं। बहुत से कोशों में शब्द पर व्याकरण की दृष्टि से भी टिप्णी रहती है। कभी कभी एक शब्द कई
व्याकरणिक इकाइयों के रूप में प्रयुक्त होता है।
      वर्णनात्मक कोश में अर्थ प्रचलन के आधार पर और ऐतिहासिक कोश में इतिहास के आधार पर दिया जाता
है। ध्यातव्य है कि व्याख्या जहाँ अपेक्षित हो वहीं दी जानी चाहिए।
          अर्थ के स्पष्टीकरण के लिये उदाहरण के लिये अर्थ के साथ उसके प्रयोग भी दिये जाते हैं। उद्धरण प्रामाणिक
होने चाहिये। उद्धरणों को कालक्रमानुसार देना चाहिए।
      कभी अर्थ, पर्याय या व्याख्या से स्पष्ट नहीं होते। ऐसी स्थिति में वस्तु का चित्र आवश्यक हो जाता है।
उच्चारण भी कोश में आवश्यक है क्योंकि मात्र सामान्य वर्तनी से वह स्पष्ट नहीं होता। हिन्दी-कोशों में
उच्चारण नहीं होता।
      व्युत्पति तो कोश का महत्त्वपूर्ण अंग है। अच्छे कोशों में इसका होना आवश्यक है। व्युत्पनि का कभी तो
सीधे संकेत कर देते हैं, कभी-कभी तुलनात्मक दृष्टि से और कभी भाषाओं के भी रूप दे देते हैं।
         ऐसा लगता है महर्षि यास्क से शुरू हुए शब्द-शास्त्र के अनुशासन से लेकर अद्यतन कोशों की स्थिति एक
बहुआयामी रूप को स्वायत्त कर चुकी है। भारत में यास्क के निरुक्त से पहले भी दो निघण्टु विद्यमान थे। आज
तो कोश-विज्ञान का संबंध कई विज्ञानों से अभिन्न रूप में जुड़ गया है। शब्दार्थ-विज्ञान बनाम कोश-विज्ञान,
शब्दार्थ-विज्ञान बनाम ध्वनि विज्ञान; भाषा-विशन बनाम कोश-विज्ञान और कोश-विज्ञान बनाम समाज भाषा विज्ञान ।
ये सभी दिशाएँ परस्पर संबंध हैं।
        आज कोशों की महत्ता अत्यधिक बढ़ गयी है। ज्यों-ज्यों ज्ञान-विज्ञान का क्षेत्र विस्तृत होता जायगा,
कोश-विज्ञान की उपादेयता त्यों त्यों बढ़ती जायगी।


Comments

Popular posts from this blog

अपने अतीत को सहन करना सबसे बड़ी क्षमा है!

विरोध-परिहार आवश्यक