विरोध-परिहार आवश्यक
विरोध-परिहार आवश्यक विरोध-परिहार का उपाय- जो पसंद है उसमें मर्यादा साधो जो नापसंद है उसमें गुण खोजो विरोध का भाव उठते ही अपने आप को साधो जब भी भीतर से नहीं, ना, ऐसा क्यों ? आखिर किसलिए? मैं ही क्यूँ ? ऐसे शब्द निकलने लगे तो तुरन्त चेत जाओ. चेतकर अपने शब्दों को वहीं रूपान्तरित कर दो. स्वयं के भीतर हर प्रवृत्ति व नैमित्तिक वातावरण के प्रति 'स्वीकार भाव' विकसित करो. विरोध करना अप्राकृतिक है, अधार्मिकपना है. धार्मिक भाव स्वीकृति है, विनम्रता है. विरोध सूचक है-लगाव और अहंकार का जब भी आपके भीतर विरोध के स्वर...