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विरोध-परिहार आवश्यक

                                           विरोध-परिहार आवश्यक विरोध-परिहार का उपाय-                        जो पसंद है उसमें मर्यादा साधो                        जो नापसंद है उसमें गुण खोजो       विरोध का भाव उठते ही अपने आप को साधो जब भी भीतर से नहीं, ना, ऐसा क्यों ? आखिर किसलिए? मैं ही क्यूँ ? ऐसे शब्द निकलने लगे तो तुरन्त चेत जाओ. चेतकर अपने शब्दों को वहीं रूपान्तरित कर दो. स्वयं के भीतर हर प्रवृत्ति व नैमित्तिक वातावरण के प्रति 'स्वीकार भाव' विकसित करो. विरोध करना अप्राकृतिक है, अधार्मिकपना है. धार्मिक भाव स्वीकृति है, विनम्रता है.                                     विरोध सूचक है-लगाव और अहंकार का         जब भी आपके भीतर विरोध के स्वर...

कौन सही, कौन गलत ?

                                        कौन सही, कौन गलत ? सामान्य व्यक्ति की सोच प्रायः इसी तथ्य के चारों ओर मँडराती रहती है कि कौन सही है, कौन गलत है ? किन्तु सही और गलत का निर्णय करने के लिए तराजू है ही कहाँ ? किसी भी स्तर पर ऐसा कोई सुनिश्चित मापदण्ड या पैमाना नहीं है जिसके आधार पर सही अथवा गलत ठहराया जा सके सही और गलत सापेक्षिक अवधारणाएं हैं जिनके अर्थ एक ही समय में अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग हो सकते हैं. किसी एक व्यक्ति के लिए कोई तथ्य, कोई विचार, कोई भावना एक समय विशेष पर सही हो सकती है, उसी व्यक्ति के लिए वही बात किसी अन्य अवसर पर गलत हो जाती है. उदाहरणार्थ जब कोई व्यक्ति अपनी पुत्री के विवाह की बात करता है, तो दहेज को अभिशाप और बुरा बताता है, वही व्यक्ति अपने पुत्र के विवाह पर दहेज लेने को सही सिद्ध करने के लिए अनेक तर्क देता है. आत्मज्ञानी पूज्य विराट गुरुदेव जब भी किसी व्यक्ति के द्वारा ऐसा सुनते कि अमुक व्यक्ति गलत है, अमुक व्यक्ति सही है, तब वे उस व्यक्ति समझाया करते थ...

प्रजातन्त्र मात्र चुनाव तन्त्र नहीं हैं

                            प्रजातन्त्र मात्र चुनाव तन्त्र नहीं हैं हमें जनतंत्र को आशीर्वाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए. हम भ्रमवश मात्र चुनाव को प्रजातंत्र का पर्याय मान बैठे हैं. वह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम प्रजातंत्र का परिणाम बनें अथवा अज्ञान की दुःखद त्रासदी. प्रजातंत्र मात्र एक शासन-पद्धति न होकर जीवन की एक महत्वपूर्ण पद्धति है जिसकी अनुभूति समानता, समरसता तथा सहिष्णुता की त्रिवेणी में स्नान करके उपलब्ध की जाती है. हमने प्रजातंत्र के सम्बन्ध में इन बातों की ओर ध्यान नहीं दिया और जनतंत्र की आदिम व्याख्या को हृदयंगम कर लिया है- लोकतंत्र जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए राज है. 'जनता के लिए' वाक्यांश को भी विवादास्पद बना दिया गया है. हम लाठी द्वारा जनतंत्र की भैंस को जंगल की ओर हाँकने में लग गए हैं.         प्रजातन्त्र में हर वयस्क नागरिक को अपना राजनीतिक भविष्य चुनने का अधिकार होता है, लेकिन भारत में पारिवारिक प्रेम की परम्पराएं प्रजातन्त्र के बालिग मताधिकार का मखौल भी उड़ाती मिल जाती हैं....

प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति बनना

                      प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति बनना प्रकृति ने हमको वरदानस्वरूप कतिपय अधिकार (शक्तियाँ) प्रदान किए हैं साथ ही उनके विलोम भी उपस्थित हैं. दोनों के मध्य अन्तर स्थापित न करने वाला मनुष्य अपने जीवन को दुःखमय बना लेता है. उचित है कि मनुष्य अपने स्वरूप और अधिकारों के प्रति सदैव सचेत रहे. ऐसा करके ही वह मनुष्य होने का दावा पूरा कर सकता है. हम सामान्यतः यही कहते हैं कि मनुष्य प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति है, परन्तु अन्य जीवधारियों के साथ तुलनात्मक अध्ययन करने पर उक्त कथन के सम्बन्ध में संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है. उदाहरणार्थ, एक साधारण से कुत्ते की सूँघने की शक्ति के मुकाबले मनुष्य बहुत पीछे है. एक सामान्य से गिद्ध अथवा चील की तीक्ष्ण दृष्टि के समक्ष मनुष्य कितनी अल्प दृष्टि वाला है, आने वाले भूकम्प और तूफान का अनुमान पशु-पक्षी बहुत पहले लगा लेते हैं. ज्ञानेन्द्रिय क्षेत्र में ही नहीं, अपितु शारीरिक शक्ति में भी उससे अधिक शक्तिशाली न जाने कितने जीव और भी हैं ? यदि कोई यह कहे कि मनुष्य ने अन्य समस्त जीवों पर अपना आ...

अपने अतीत को सहन करना सबसे बड़ी क्षमा है!

                   अपने अतीत को सहन करना सबसे बड़ी क्षमा है!   "तुम सोने से पहले सबको क्षमा कर दो,                            तुम्हारे जागने से पहले मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा।"       आज की हर प्रतिकूलता स्वयं के अतीत के संचयकोष से ही उभरकर आई है, अतः उसे सहना अपने अतीत को सहना ही तो है. क्या हम खुद को सहन कर पाते हैं ? नहीं ! यदि हम सभी अपने आपको सहन कर लें तो अपने जीवन के हर तनाव को सहन कर लेंगे स्वयं को न सहन कर पाने के कारण ही हम आवेशित हो जाते हैं, आक्रोशित हो जाते हैं, परेशान और खिन्न हो जाते हैं, जब भीतर में उठ रहे आवेग सहनशीलता की सीमा लांघ जाते हैं, तो हमारे भीतर की कुंठा और क्रोध बाहर निकलने लगता है और कभी कलह, तो कभी अपराध का रूप धारण कर लेते हैं. अपनी कुंठाएं न सह पाने पर इंसान दूसरों को शारीरिक आर्थिक हानि पहुँचाने का प्रयास करता है, कभी-कभी वह अपने प्रतिद्वन्द्वियों और शत्रुओं की हत्या तक कर देता है.        बाहर अभि...

भारतीय संस्कृति एवं पाश्चात्य संस्कृति के अन्तर को जानना

 भारतीय संस्कृति एवं पाश्चात्य संस्कृति के अन्तर को जानना भारतीय संस्कृति का विकास प्रकृति के क्रोड में हुआ है और वह ऋषि-कृषि संस्कृति कही जाती है. पाश्चात्य अथवा नगरीय संस्कृति ईंट-पत्थरों के मकानों को सर्वस्व मानती है.          भारतीय संस्कृति ऊर्ध्वगामी एवं आंग्ल विधायिका है. पाश्चात्य संस्कृति यूरोपीय पानी मिट्टी को सर्वस्व मानती है. विश्व मानव की वंदना करके भारतीय मनीषा को अपने से विलग कर रखा है. संस्कृति मानवीय साधना का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप है.         हम लोग भारतीय संस्कृति एवं पाश्चात्य संस्कृति- इन शब्दों का प्रयोग प्रायः करते हैं. यह पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव है. भारतीय संस्कृति में ऐसा नहीं पाया जाता है आदि वाक्यों का प्रयोग भी लोग करते देखे हैं. इन प्रयोगकर्ताओं में बहुत कम व्यक्ति ऐसे होंगे जो उक्त शब्दों के निहितार्थ से अवगत होंगे तथा उनके मूलभूत तत्वों से परिचित होंगे.          डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, "मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएं ही संस्कृति हैं.     अंग्रेजी विद्वान् एवं ...

क्रोध और कामुकता पर विजय प्राप्त करें

                     क्रोध और कामुकता पर विजय प्राप्त करें समस्त विघटन एवं विनाश के मूल में हमारी ये दो प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं-काम और क्रोध. श्रीमदभगवद् गीता का कथन द्रष्टव्य है-                     ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।                     संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ।।                     क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।                     स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।          अर्थ-विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है और आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना (में विघ्न पड़ने) से क्रोध उत्पन्न होता है.         क्रोध से अविवेक अर्थात् मूढ़भाव उत्पन्न होता है और अविवेक से स्मरण शक...